बिहार हूँ मैं !
मानव रूपी भारत के दिल में बसे, 10 करोड़ परिश्रमी तथा मेधावी लोगो से बहार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं !
सर पे मुकुट हिमालय, सिने में राजगीर का सौंदर्य, गंगा-गंधक का कछार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं !
मुझको अगर जानना है तो थोड़ा अतीत में चलते है
भारतबर्ष की गौरव-गाथा जिस भूभाग पर पलते है
सुना तो होगा चन्द्रगुप्त, जिसने अखण्ड भारत का निर्माण किया
क्या बर्मा क्या पाकिस्तान, था अफगानिस्तान को उसने साध लिया.
समुद्रगुप्त का वह शासन, जो भारत का स्वर्णकाल कहलाता है
सम्राट अशोक का राज-चिह्न अब देश का मन बढ़ता है
मेरा होकर बिक्रमादित्य बनना, पूरी दुनिया ने जाना है
पाटलिपुत्र का शौर्य-पराक्रम, इतिहास बखूबी माना है
बीरता ज्ञान या प्रेम त्याग, हमसे होती पूरी है
आर्यबर्त के प्रगति-चक्र की झांकी, मेरे बिना अधूरी है
अखण्ड भारत के काल खण्ड का यादगार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं ! !!
जब देश पर आन पड़ी बिपदा भारी
अंग्रेजो ने जकड़ी थी माँ भारती हमारी
दूर फिरंगी को करने को, जब भड़की जौहर-ज्वाला
80 साल का शेर कुंवर सिंह, पहली आहुति देने हुआ मतवाला
गिन गिन कर मारे फिरंगी समर में
सहम गयी थी दिल्ली, थी नैया बीच भवर में
इसी नीव पर आजादी को, जब फिर से खरे हुए जबांज
चम्पारण की धरती से, गांधी ने था किया आगाज
खौला फिर गंगा का पानी, थी बिरसा ने मशालें थामी
सचिवालय पे हो अपना तिरंगा, सड़कों पे भर गए सेनानी
सांसें टूटी पर न झुका तिरंगा, जनो मेरी बलिदान कहानी
7 martyrs के हुंकार को सुनकर तख़्त फिरंगी डोल गया
आजादी बस एक ही मकसद राजेंद्र, जयप्रकाश था बोल गया
उस स्वतंत्रता महायज्ञ में कुर्बान, हजारो बीर सपूतो का ललकार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं !!!
ऐसा भी नहीं की मैंने पहली बार. सन् 47 में हीं लोकतंत्र पाया
दुनिया का पहला गणतंत्र, मेरे लिछछवी में हीं आया
छठी ईशा-पूर्व से हीं, प्रजा यहाँ अपना शासक चुनती थी
एक पंथनिरपेक्ष, शिक्षाप्रद, विकसित राज्य का सपना बुनती थी
नई सोच नये बिचार की यहाँ सदा आजादी थी
तभी तो यह धरती धर्म गुरुओं का घर बन जाती थी
बुद्ध, महावीर, गुरु गोविन्द सिंह सबने पाए ज्ञान यही
बौद्ध, जैन आदिधर्मो का, रहा हू उद्गमस्थान मैं हीं
भारतीयता को चिन्हित करती, त्याग-तपश्या की प्रतिमूर्ति, सीता का अवतार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं !!
मैं हूँ हिन्द का वह टुकड़ा, जिसने देश को सर्वदा मान दिया
प्राचीन, मध्यकालीन या आधुनिक हर कालखण्ड में, इसे ऊँची पहचान दिया
जब थी दुनिया जंगलों में बसती, नालंदा ने विश्व को ज्ञान पढ़ाया
चाँद तारों के रहस्य समझने को, आर्यभट ने गणित विज्ञान बताया
आचार्य चाणक्य का अर्थशास्त्र, विकशित राज्य का मार्ग बना
कूटनीति का अमूल्य ज्ञान, राजनीती का निदान बना
मैंने दिया देश को पहला राष्ट्रपति, भारत जब आजाद हुआ
जेपी ने सिखलाया संपूर्ण क्रांति, जब अहंकार और भ्रस्टाचार का राज हुआ
विज्ञान, वाणिज्य, साहित्य, धर्मग्रन्थ, तथा राजनीती शास्त्र का भंडार हूँ मैं
बिहार हूँ मैं !!
मैथिल कोकिल विद्यापति का गीत और राष्ट्रकवि दिनकर का क्रन्तिकारी विचार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं ! !!
मानव रूपी भारत के दिल में बसे, 10 करोड़ परिश्रमी तथा मेधावी लोगो से बहार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं !
सर पे मुकुट हिमालय, सिने में राजगीर का सौंदर्य, गंगा-गंधक का कछार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं !
मुझको अगर जानना है तो थोड़ा अतीत में चलते है
भारतबर्ष की गौरव-गाथा जिस भूभाग पर पलते है
सुना तो होगा चन्द्रगुप्त, जिसने अखण्ड भारत का निर्माण किया
क्या बर्मा क्या पाकिस्तान, था अफगानिस्तान को उसने साध लिया.
समुद्रगुप्त का वह शासन, जो भारत का स्वर्णकाल कहलाता है
सम्राट अशोक का राज-चिह्न अब देश का मन बढ़ता है
मेरा होकर बिक्रमादित्य बनना, पूरी दुनिया ने जाना है
पाटलिपुत्र का शौर्य-पराक्रम, इतिहास बखूबी माना है
बीरता ज्ञान या प्रेम त्याग, हमसे होती पूरी है
आर्यबर्त के प्रगति-चक्र की झांकी, मेरे बिना अधूरी है
अखण्ड भारत के काल खण्ड का यादगार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं ! !!
जब देश पर आन पड़ी बिपदा भारी
अंग्रेजो ने जकड़ी थी माँ भारती हमारी
दूर फिरंगी को करने को, जब भड़की जौहर-ज्वाला
80 साल का शेर कुंवर सिंह, पहली आहुति देने हुआ मतवाला
गिन गिन कर मारे फिरंगी समर में
सहम गयी थी दिल्ली, थी नैया बीच भवर में
इसी नीव पर आजादी को, जब फिर से खरे हुए जबांज
चम्पारण की धरती से, गांधी ने था किया आगाज
खौला फिर गंगा का पानी, थी बिरसा ने मशालें थामी
सचिवालय पे हो अपना तिरंगा, सड़कों पे भर गए सेनानी
सांसें टूटी पर न झुका तिरंगा, जनो मेरी बलिदान कहानी
7 martyrs के हुंकार को सुनकर तख़्त फिरंगी डोल गया
आजादी बस एक ही मकसद राजेंद्र, जयप्रकाश था बोल गया
उस स्वतंत्रता महायज्ञ में कुर्बान, हजारो बीर सपूतो का ललकार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं !!!
ऐसा भी नहीं की मैंने पहली बार. सन् 47 में हीं लोकतंत्र पाया
दुनिया का पहला गणतंत्र, मेरे लिछछवी में हीं आया
छठी ईशा-पूर्व से हीं, प्रजा यहाँ अपना शासक चुनती थी
एक पंथनिरपेक्ष, शिक्षाप्रद, विकसित राज्य का सपना बुनती थी
नई सोच नये बिचार की यहाँ सदा आजादी थी
तभी तो यह धरती धर्म गुरुओं का घर बन जाती थी
बुद्ध, महावीर, गुरु गोविन्द सिंह सबने पाए ज्ञान यही
बौद्ध, जैन आदिधर्मो का, रहा हू उद्गमस्थान मैं हीं
भारतीयता को चिन्हित करती, त्याग-तपश्या की प्रतिमूर्ति, सीता का अवतार हूँ मैं,
बिहार हूँ मैं !!
मैं हूँ हिन्द का वह टुकड़ा, जिसने देश को सर्वदा मान दिया
प्राचीन, मध्यकालीन या आधुनिक हर कालखण्ड में, इसे ऊँची पहचान दिया
जब थी दुनिया जंगलों में बसती, नालंदा ने विश्व को ज्ञान पढ़ाया
चाँद तारों के रहस्य समझने को, आर्यभट ने गणित विज्ञान बताया
आचार्य चाणक्य का अर्थशास्त्र, विकशित राज्य का मार्ग बना
कूटनीति का अमूल्य ज्ञान, राजनीती का निदान बना
मैंने दिया देश को पहला राष्ट्रपति, भारत जब आजाद हुआ
जेपी ने सिखलाया संपूर्ण क्रांति, जब अहंकार और भ्रस्टाचार का राज हुआ
विज्ञान, वाणिज्य, साहित्य, धर्मग्रन्थ, तथा राजनीती शास्त्र का भंडार हूँ मैं
बिहार हूँ मैं !!
बिहार हूँ मैं ! !!