Tuesday, January 29, 2013

नेपथ्य

वो लम्हें वो खुशियाँ , शरारत, कुछ गम 
यादों में अक्सर वो बचपन वो कल
कुछ यादें कुछ बातें जब परेशान कर जाती है 
थकी थकी आँखों को  नींद कम आती है
पराया सा लगने लगता है तब ओबामा तेरी गलियाँ
ये मूरत, ये सूरत , ये भीड़, ये दुनिया
माँ की ममता शायद उस वक़्त पूछती होगी 
दरवाजे की हर आहत पर मुझको ढुंढ़ती होगी।
अपने सपनों की चाहत में बजारों में भटकना 
उम्मीद तो होगी ही पिता को, मेरा शाम तक घर लौटना।
वेबजह याद करने का  मन करता है,  तब जिंदगी के उस हिस्से को 
इस छोटी सी दुनिया के बड़े भीड़ में, खोये हुए उन किस्सों को।
ये आपा-धापी दौड़ा-दौड़ी, थी उन गलियों की बात कहाँ 
कम थी चाहत कम थे सपने, पर अपनों का था साथ जहाँ।
स्कूल रोज जाना तब कितना अजीब था 
सिनेमा रोड दूर होकर भी ज्यादा करीब था।
वो Saturday-Sunday को घंटो Antenna घुमाना 
रेडियो पे गीत, दूरदर्शन का जमाना
वो अधवारा की धारा, लखन्देइ की पानी 
किनारे को तलासती कुछ अधूरी कहानी।
खामोशियां उस मंजर को ख़त्म कर देगा 
कुछ भी  कह पाने का गम तो शायद उन्हें भी होगा।
यारों संग गुजरती वो क्रिकेट की शाम 
ऊँची महलों की खिडकियों  से ताकते उनसभी third-umpires के नाम।
अमीरजादों के शौक से तो लड़के अब भी जलते होंगे 
नाजनीनो की जुल्फों पे तो वो अब भी मरते होंगे।
कुछ दोस्त जो मुझसे दूर गए, कुछ छोड़ गए कुछ छुट गए 
यारों तेरे साथ उन सडको पे फिर से भटकने का मन करता है 
तेरी हर जीत पे उछलनेतेरी हार पे ठीठकने  का मन करता है।
पर सुना है देश की आवो-हवा कुछ ज्यादा ही बदल रही है 
सच्चाई दर-बदर,  इंसानियत बस यू  ही जल रही है।
दिल्ली तेरी दामिनी या माँ सीता तेरी धरती की कन्चंबाला 
सब की कहानी एक सी, जख्म के बाद ही याद आना
चाहा ही होगा तुमने, ढ़ेरों खुशियाँ भी
पर मुल्क दे सका, आबरू क्या जिंदगी भी
बेहोश जब तुम सड़को पे तरपती रही,
लोग तमाशबीन, प्रशासन सीमा विवाद में उलझी रही।
सब देख, यह पराया मुल्क भी तब अपना सा लगता है 
इतना ही सुरक्षा सूकुन अपने भी मुल्क में, क्यूँ सपना सा लगता है।

फिर भी किसी ने कहा  है;
मौज मने या आंधी आये दिया जलाये रखना है,
घर के खातिर सौ दुःख झेलें, घर तो आखिर अपना है 


8 comments:

  1. टच कर गयी भाई!!

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  2. बहुत प्यारी कविता है.....

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  3. Replies
    1. धन्यवाद !!!!!! परिस्थिति सोचने को मजबूर करती है ..पर मिल कर लड़ना है हम सभी को।।

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  4. good one ... finally today read it. Liked it :)

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  5. अच्छा प्रस्तुतीकरण !
    जुगनू के तीन रूप-गुण:-'
    अन्धेरे में उजाले का सामावेश,मल खाकर प्रकाश का निर्माण, ज़माना भी मार्श गैस आदि बना कर यही कर रहा है | घोर निराशा में आशा की चिनगारी |

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  6. प्रशंसनीय प्रस्तुति

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